Tuesday, May 08, 2007

मला माहिती आहे की कुठलीही नविन कविता ही कशावरुन तरी सहज सुचलेली असते। निदान माझ्या बाबतीत तरी हे खर आहे। म्हणूनच मी माझी कवीता निरपेक्ष मानत नाही। अनुभवांना कल्पनेची जोड़ लाभली की कवितेचा जन्म...मग ती भाषेचिही बन्धनं तोडून सरळ काळजाला हात घालते।
पुढील कविता 'अजनबी शहर है, अजनबी शाम है, जिंदगी अजनबी क्या तेरा नाम है !!' वरुन सहज सुचलेली।

एक पल का ठहराव और थम सी जाती है जिंदगी
हर पल नए ख्वाब दिखाती है जिंदगी॥


मुमकिन नही भूल जाना तुम्हे
हर पल याद दिलाती है जिंदगी॥


हर हसीं लम्हा अब पराया सा लगता है
बादलों में घिरकर उदासी सी छा जाती है जिंदगी॥

हमसे बिछड़ के क्या खुश रह पाओगे तुम
हर वक़्त यह सवाल उठाती है जिंदगी॥

पर जब भी हमें देख कर एक चेहरा मुस्कुराता है
हमसे नाराज ना होना यही पैगाम दे जाती है जिंदगी...








0 comments: